#पद्मश्री_मधु_मंसूरी_की_कहानी ।
सबसे पहले पुरे सदान समाज की ओर से अपने सदान समाज एवं पुरे झारखंड का नाम गौरन्वित करने वाले सदान मधु मंसुरी हंसमुख जी को हार्दिक बधाई और ढेर सारा शुभकामनाएं।
गांव छोड़ब नहीं जंगल छोड़ब नहीं,,, नागपुर कर कोरा नदी नाला टका टूकू वन रे पतारा...जैसे चर्चित सदानी (नागपुरी) गीत के रचयिता और नाम के अनुरूप अपनी खराश भरी आवाज में उसे गुंजायमान करने वाले गीतकार लोकगायक समाज सेवक मधु मंसूरी अब पद्मश्री हो चुके हैं।
उनके गीत को जंगल, पहाड़, शहर-डगर और गांव-खलियान में प्रतिनिधि लोकगीत के दर्जा हासिल कर चुके हैं। 7 साल की उम्र में पहली बार गीत गाने वाले झारखंड के लोक गीतकार-लोकगायक को 73 साल में पद्मश्री । मधु मंसूरी जी बताते हैं की 2 अगस्त 1956 की तारीख रातू ब्लॉक के शिलान्यास का मौका था। मुख्य अतिथि रातू महाराजा चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव थे। उन्होंने घासीराम के गीत दूर देसे...को मधुर-मुखर स्वर में सुनाया था। तालियां तो बजनी ही थीं।
गांव छोड़ब नहीं जंगल छोड़ब नहीं...इस गीत के रचयिता और गायक एक सदान हैं जो अपनी मातृभाषा सदानी (सादरी/नागपुरी) में लिखा है और गाया है। ये गीत किसी एक समुदाय विशेष के लिए नहीं है यानी ये न केवल सदान समुदाय के लिए है और न ही आदिवासी समुदाय और न ही किसी दुसरे समुदायों के लिए है बल्कि ये गीत पुरे झारखंडवासीयों के दर्द को सामने रखकर एक सदान ने अपने गीतों में बयान किया, लेकिन इस गीत को तथाकथित कुछ लोग कुछ गलत शक्तियां जो हमेशा दलित आदिवासी दलित आदिवासी करके अपना राजनीति धंधा चलाते हैं वो सोशल मिडिया में इस गीत को Adivasi National Anthem Song बोलकर बोलकर गुमराह कर रहे हैं गलत और झूठ फैला रहे हैं ...😀😀😀 इतना ज्यादा भी सम्प्रदायिक नहीं होना चाहिए, जो हम सदानों के भाषा गीत संगीत को आदिवासी का... इतना की सदानों को भी आदिवासी बता बताकर झूठ फैलाओ गुमराह करो।
सदानों के अस्तित्व मातृभाषा गीत संगीत संस्कृति के साथ राजनीति खेल असम और बंगाल में आदिवासी संगठनों के तथाकथित नेताओं के द्वारा शुरू हुआ और यहीं से एक बड़े झूठ का गलत प्रचार प्रसार किया गया और किया जाता रहा है और सदान अस्तित्व वजूद को मिटाने की राजनीति षड़यंत्र चलता रहा है।
न जाने ऐसे कई झूठ फैलाये हैं और फैला रहे हैं और सदान के अस्तित्व को जानबूझकर मिटाने की एक बहुत बड़ी राजनीति साजिश किये जा रहे हैं, क्योंकि झूठ फैलाने वाले लोग जानते हैं जनता Real Fact को कभी जानने का कोशिश करता नहीं हैं, इसलिए आसानी से तथाकथित लोग उनके मनमुताबिक जैसे फायदा वैसे झूठ फैलाकर गुमराह करते हैं।
#झारखंड के सदान समाज के समाजिक संगठन सदान मोर्चा के सदस्य भी हैं मधु मंसुरी हंसमुख जी और अपने सदान समाज के सेवा में तथा झारखंडवासियों के सेवा में भी अपना पुर्ण योगदान दे रहे हैं।
हमारे सदान सच में बहुत भोले हैं, बिल्कुल जागरूक नहीं हैं इसी का फायदा कुछ गलत शक्तियां हैं और उन गलत शक्तियों का साथ दे रहे हैं हमारे अपने सदान समाज के ही चंद लोभी गद्दार लोग जो हम सदानों को दबाने कुचलने मिटाने में हमेशा लगे रहते हैं और लगे हुए हैं। हमारे सदानी लोग कभी भी अपने Sadan Identity... अपने हक आधिकार... अपने धरोहर को लेकर सचेत नहीं रहा... और यही कारण है की Sadan Community आज एक गुमनामी में है और हम सदानों के धरोहर हमारी मातृभाषा सदानी यानी सादरी (नागपुरी) गीत संगीत संस्कृति को कुछ तथाकथित आदिवासी नेता आदिवासी संगठन वाले आदिवासी का बताकर हम सदानों के पहचान को दबाने कुचलने में लगे हुए हैं।
बिगड़ा अभी भी कुछ नहीं है... कहते हैं न जब जागो तब ही सबेरा है,,, और हमारे सोये हुवे सदानों को अब जागने की जरूरत है और अपने धुमिल होते identity को बचाना है और दुनिया को बताना है... बिखरे हुवे सदान जाती गोष्ठीयों को एकजुट होना है और अपने सदान समाज को एक मजबुत समाज बनाकर अपने धुमिल होते अस्तित्व को बचाने अपने हक आधिकार के लिए आवाज बुलंद करना है...हम सदान हैं सदानी (सादरी/नागपुरी) भाषा संस्कृति गीत संगीत हमारी पहचान है।
#जय_हिंद_जय_भूमिपुत्र_सदान
#सदान_एकता_जिन्दाबाद
सबसे पहले पुरे सदान समाज की ओर से अपने सदान समाज एवं पुरे झारखंड का नाम गौरन्वित करने वाले सदान मधु मंसुरी हंसमुख जी को हार्दिक बधाई और ढेर सारा शुभकामनाएं।
गांव छोड़ब नहीं जंगल छोड़ब नहीं,,, नागपुर कर कोरा नदी नाला टका टूकू वन रे पतारा...जैसे चर्चित सदानी (नागपुरी) गीत के रचयिता और नाम के अनुरूप अपनी खराश भरी आवाज में उसे गुंजायमान करने वाले गीतकार लोकगायक समाज सेवक मधु मंसूरी अब पद्मश्री हो चुके हैं।
उनके गीत को जंगल, पहाड़, शहर-डगर और गांव-खलियान में प्रतिनिधि लोकगीत के दर्जा हासिल कर चुके हैं। 7 साल की उम्र में पहली बार गीत गाने वाले झारखंड के लोक गीतकार-लोकगायक को 73 साल में पद्मश्री । मधु मंसूरी जी बताते हैं की 2 अगस्त 1956 की तारीख रातू ब्लॉक के शिलान्यास का मौका था। मुख्य अतिथि रातू महाराजा चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव थे। उन्होंने घासीराम के गीत दूर देसे...को मधुर-मुखर स्वर में सुनाया था। तालियां तो बजनी ही थीं।
गांव छोड़ब नहीं जंगल छोड़ब नहीं...इस गीत के रचयिता और गायक एक सदान हैं जो अपनी मातृभाषा सदानी (सादरी/नागपुरी) में लिखा है और गाया है। ये गीत किसी एक समुदाय विशेष के लिए नहीं है यानी ये न केवल सदान समुदाय के लिए है और न ही आदिवासी समुदाय और न ही किसी दुसरे समुदायों के लिए है बल्कि ये गीत पुरे झारखंडवासीयों के दर्द को सामने रखकर एक सदान ने अपने गीतों में बयान किया, लेकिन इस गीत को तथाकथित कुछ लोग कुछ गलत शक्तियां जो हमेशा दलित आदिवासी दलित आदिवासी करके अपना राजनीति धंधा चलाते हैं वो सोशल मिडिया में इस गीत को Adivasi National Anthem Song बोलकर बोलकर गुमराह कर रहे हैं गलत और झूठ फैला रहे हैं ...😀😀😀 इतना ज्यादा भी सम्प्रदायिक नहीं होना चाहिए, जो हम सदानों के भाषा गीत संगीत को आदिवासी का... इतना की सदानों को भी आदिवासी बता बताकर झूठ फैलाओ गुमराह करो।
सदानों के अस्तित्व मातृभाषा गीत संगीत संस्कृति के साथ राजनीति खेल असम और बंगाल में आदिवासी संगठनों के तथाकथित नेताओं के द्वारा शुरू हुआ और यहीं से एक बड़े झूठ का गलत प्रचार प्रसार किया गया और किया जाता रहा है और सदान अस्तित्व वजूद को मिटाने की राजनीति षड़यंत्र चलता रहा है।
न जाने ऐसे कई झूठ फैलाये हैं और फैला रहे हैं और सदान के अस्तित्व को जानबूझकर मिटाने की एक बहुत बड़ी राजनीति साजिश किये जा रहे हैं, क्योंकि झूठ फैलाने वाले लोग जानते हैं जनता Real Fact को कभी जानने का कोशिश करता नहीं हैं, इसलिए आसानी से तथाकथित लोग उनके मनमुताबिक जैसे फायदा वैसे झूठ फैलाकर गुमराह करते हैं।
#झारखंड के सदान समाज के समाजिक संगठन सदान मोर्चा के सदस्य भी हैं मधु मंसुरी हंसमुख जी और अपने सदान समाज के सेवा में तथा झारखंडवासियों के सेवा में भी अपना पुर्ण योगदान दे रहे हैं।
हमारे सदान सच में बहुत भोले हैं, बिल्कुल जागरूक नहीं हैं इसी का फायदा कुछ गलत शक्तियां हैं और उन गलत शक्तियों का साथ दे रहे हैं हमारे अपने सदान समाज के ही चंद लोभी गद्दार लोग जो हम सदानों को दबाने कुचलने मिटाने में हमेशा लगे रहते हैं और लगे हुए हैं। हमारे सदानी लोग कभी भी अपने Sadan Identity... अपने हक आधिकार... अपने धरोहर को लेकर सचेत नहीं रहा... और यही कारण है की Sadan Community आज एक गुमनामी में है और हम सदानों के धरोहर हमारी मातृभाषा सदानी यानी सादरी (नागपुरी) गीत संगीत संस्कृति को कुछ तथाकथित आदिवासी नेता आदिवासी संगठन वाले आदिवासी का बताकर हम सदानों के पहचान को दबाने कुचलने में लगे हुए हैं।
बिगड़ा अभी भी कुछ नहीं है... कहते हैं न जब जागो तब ही सबेरा है,,, और हमारे सोये हुवे सदानों को अब जागने की जरूरत है और अपने धुमिल होते identity को बचाना है और दुनिया को बताना है... बिखरे हुवे सदान जाती गोष्ठीयों को एकजुट होना है और अपने सदान समाज को एक मजबुत समाज बनाकर अपने धुमिल होते अस्तित्व को बचाने अपने हक आधिकार के लिए आवाज बुलंद करना है...हम सदान हैं सदानी (सादरी/नागपुरी) भाषा संस्कृति गीत संगीत हमारी पहचान है।
#जय_हिंद_जय_भूमिपुत्र_सदान
#सदान_एकता_जिन्दाबाद

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